मनुष्य शरीर एक प्रभावशाली धारण किये हुए है जो अपने पास वालों पर अनिवार्य रूप से असर डालती है। मजबूत विचारों का दूसरों पर असर जरूर पड़ता है। अगर आप अपृ हों और आरम्भिक अभ्यास हों तो बुरे चरित्र और दुष्ट विचार वालों से दूर रहिए। उनके कार्यों में कोई दिलचस्पी मत लीजिए। हो सके तो अरुचि प्रकट कीजिए। इससे आप उनके संक्रामक असर से बचे रहेंगे। सत्संग की महिमा अपार है। श्रेष्ठ पुरुषों का साथ गंगा के समान है।
जिसमें गोता लगाने से क्लेष कटने से श्रेष्ठ पुरुषों के साथ रहने से, उनके मौखिक या लेखबद्ध विचारों मनन करने से आत्मोत्थान होता है। यदि आप अपने को अत्यंत सुदृढ़ समझते हैं तो संसार की दृष्टि से बुरे विचार वाले को अपने साथ ले जा सकते हैं। परन्तु सावधान कहीं उसका उलटा असर आप पर न हो जाये। दूसरे के अवगुण देखना अपनी बुद्धि को दूषित करना है। फोटो खींचने के कैमरे के सामने जो चीज रखी जाती है उसी का अक्स भीतर प्लेट पर खिंच जाता है।
यदि आप दूसरों की बुराइयां देखेंगे तो उनके चित्र अपने अंदर अंकित करके उन्हें खुद भी ग्रहण कर लेंगे। इसलिए दूसरों के सद्गुणों पर ही दृष्टि रखिये। सबमें परमात्मा का स्वरूप देखिये और उन्हें प्रेम की दृष्टि से देखिये, आपका हृदय प्रसन्न रहेगा। यदि किसी में बुराई दिखाई पड़े तो उससे घृणा मत कीजिए और जहां तक हो सके, सुधारने का प्रयत्न कीजिए।
परदोष दर्शन के कारण जो घृणा और द्वैष मन में उत्पन्न होते हैं, वह भीतर ही भीतर अशान्ति उत्पन्न करके मन को निश्चित पथ से ढिगा देते हैं। साधना को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है कि किसी की गंदगी टटोल कर अपनी नाक को दुर्गंधित न किया जाये। अपने मजहब, विचार, या विश्वासों पर दृढ़ रहना उचित है। परन्तु दूसरों के विश्वासों को घृणा की दृष्टि से देखना या झूठा समझना अनुचित है।
हम सब सत्य के आसपास चक्कर काट रहे हैं। किन्तु कोई पूर्ण सत्य तक नहीं पहुंच सका है। इसलिए हमें एक दूसरे के प्रति उदार होना चाहिए। दूसरों के दृष्टिकोण को ध्यान पूर्वक देखना चाहिए और सत्य को स्वीकार करने को उद्यत रहना चाहिए। कट्टरता ऐसा दुर्गण है जिसके कारण आदमी न तो अपनी बुराइयों को छोड़ सकता है और न अच्छाइयों को ग्रहण कर सकता है।
आध्यात्मिक साधक का मार्ग अत्यंत दुर्गम है। यह मार्ग अनेक बाधाओं, समस्याओं तथा संशयात्मक भीषण अरण्यों से होकर जाता है। इसमें एक विरोधी तत्व यह है कि हमारा मन ही हमारा शत्रु है, जिसे हमारा मित्र बनना चाहिए था और सत् परामर्श देना चाहिए था।





