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कितनी सफल होगी पुलिस कमिश्नर प्रणाली!

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आईपीएस अफसरों की मुराद पूरी हो गई। कोई बवाल हो अथवा सामान्य धरना-प्रदर्शन, उन्हें आईएएस अधिकारियों की सहमति और उनके रुख पर निर्भर रहना पड़ता था। छोटी सी छोटी बात पर भी वे आईएएस अफसरों का मुंह निहारते थे, लेकिन अब जब उन्हें लखनऊ और नोएडा में आईएएस अधिकारियों के सामने हाथ बांधे खड़े रहने की मजबूरी से छुटकारा मिल गया है तो निश्चित रूप से उनकी जिम्मेदारी में भी इजाफा हो गया है। इसमें कानून-व्यवस्था का मुद्दा सबसे अहम होगा।

वैसे आईएएस अधिकारियों को तो प्रशिक्षण भी सबसे पहले इसी पहलू का दिया जाता है। कानून-व्यवस्था को लेकर बात बिगड़ने पर उसका ठीकरा भी इन्हीं आईएएस अफसरों पर फोड़ा जाता है और इसकी कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ती है। पर, अब तो यह सारी जिम्मेदारियां उन आईपीएस अधिकारियों के कंधों पर आ गई हैं, जिनको लेने के लिए वे लालायित रहते थे। अब निश्चित रूप से कहा जाएगा कि उत्तर प्रदेश के आईपीएस अफसरों के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है यह जिम्मेदारी।

पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने के शुरुआती 20 दिनों की बात की जाए तो राजधानी लखनऊ में ही एक बड़ा कांड हुआ। एक हिंदूवादी नेता की गोली मारकर दिनदहाड़े हत्या कर दी गई। पुलिस ने हफ्ते भर में इस केस का खुलासा करके तीन गिरफ्तारयिां तो की हीं, शूटर को भी एक मुठभेड़ में गिरफ्तार कर लिया गया। इस खुलासे के लिए पुलिस टीम की शासन स्तर से तारीफ भी हुई और उसे इनाम भी मिला। पर, इस सारे घटनाक्रम में किंतु-परंतु वाले पहलू ने पुलिस की गोलमोल कार्यप्रणाली की याद भी दिला दी।

जिस आरोपी को पुलिस लखनऊ में मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार करना बता रही है, उसे एक दिन पूर्व मुंबई से गिरफ्तार करने का दावा पुलिस के एक धड़े ने ही किया था। यह बात दीगर है कि दूसरे दिन पुलिस कमिश्नर सुजीत पांडे ने गिरफ्तारी का खंडन किया लेकिन उसी रात उसी आरोपी शूटर को लखनऊ में मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया गया। चूंकि अब पुलिस के पास ही मैजिस्ट्रेटी अधिकार भी हैं, इसलिए उसे ऐसे विवादों से बचना होगा, अन्यथा उसकी कार्यप्रणाली पर निश्चित रूप से सवालिया निशान लगेंगे।

कमिश्नर प्रणाली लागू होने के बाद पुलिस अफसरों को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि अब उनका दायरा बढ़ गया है। न्याय के क्षेत्र में भी उनकी दखल के बाद उनसे कुछ नए और पारदर्शी सिस्टम की उम्मीद की जा रही है। इसके लिए उन्हें पर्याप्त संख्या में अधिकारियों के साथ पुलिस बल भी दिया गया है। पहले लखनऊ की जिम्मेदारी सिर्फ एक आईपीएस (एसएसपी) के हवाले होती थी। पर, अब राजधानी की कानून-व्यवस्था और अपराध रोकने की जिम्मेदारी 13 आईपीएस अधिकारी संभालेंगे।

पुलिस बल भी बढ़ा दिया गया है। इसी तरह पहले जहां नोएडा में भी एक आईपीएस अफसर अपराध रोकने का भार उठाता था, वहीं अब वहां भी 10 आईपीएस अधिकारी यह जिम्मेदारी उठाएंगे। ऐसे में आमजन, खासतौर पर महिलाओं और छात्र-छात्राओं की तो यही उम्मीद होगी कि उनको अपराधों का सामना न करना पड़े तथा भयरहित होकर घरों से निकल सकें।

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