सिंधी संस्कृति में होली का महत्व विषय पर सम्पन्न हुयी संगोष्ठी
लखनऊ। भाषा विभाग, उत्तर प्रदेश शासन के प्रमुख सचिव मनीष चौहान के मार्गदर्शन में उत्तर प्रदेश सिन्धी अकादमी द्वारा आज इंदिरा भवन लखनऊ में सिंधी संस्कृति में होली का महत्व विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की गयी। कार्यक्रम में सर्वप्रथम भगवान झूलेलाल की प्रतिमा पर राजाराम भागवानी, रिटा0 आई0जी0 आर0पी0एफ0, सिंधी विद्वान पटेल दास , सिंधी विद्वान प्रकाश गोधवानी, डॉ0 कोमल असरानी, गीता, श्रीमती कनिका गुरनानी आदि ने माल्यार्पण कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया गया। कार्यक्रम में सर्वप्रथम वक्ता डॉ0 कोमल असरानी ने होली के महत्व पर कहा कि यह त्योहार प्रेम, सद्भाव व समरसता बढ़ता है। रीतू कर्मचंदानी ने बताया कि होली जीवन के विभिन्न रंगों को जीवन्त व उल्लास के साथ जीने का संदेश देता है। उन्होंने सिंधी कविता पढ़ी: होली आहे रंगन जो त्योहार,सभु कयॅू हिक बिये सां प्यार…कनिका गुरूनानी ने बताया कि यह पर्व नववर्ष के आगमन एवं गत वर्ष की विदाई का प्रतीत है और साथ ही हो ली अर्थात जो हो गया सो हो गया अब वैर द्वेष भुलाकर नये वर्ष की तैयारी है। और यहीं संदेश सिंधी धर्म में भी प्रचारित एवं प्रसारित किया जाता है। गीता हरजानी द्वारा अवगत गया कि सिंधी समाज में होली की पूजा घीयर के बिना नहीं होती है। दिखने में यह जलेबी की तरह है, लेकिन इसका स्वाद और साइज जलेबी से जुदा है। अभिषेक कुमार अखिल द्वारा अवगत कराया गया कि होली का त्यौहार हमें प्रेम, एकता, और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है। यह त्यौहार हमें पुरानी बातों को भूलकर नए सिरे से शुरूआत करने और खुशियों के साथ जीने की प्रेरणा देता है।





