चीन और वहां का सत्ता प्रतिष्ठान ऐसे महाधूर्त लोगों के अधीन है जो हमेशा बोलते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। भारत चीन के इस दो-मुंहे रवैये के कारण कई बार गफलत में पड़कर बहुत नुकसान उठा चुका है। लेकिन पड़ोसी देश होने के कारण चीन जैसे बदमाश से भी भारत को बार-बार वार्ता के लिए मजबूर होना पड़ता है।
1949 में चीनी क्रांति के बाद से चीन ने वन चाइना पालिसी के नाम पर कई देशों पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया, कई देशों पर हमले करके उनकी जमीनें छीन लीं, मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन किया, दूसरे देशों की भाषा, संस्कृति पर हमले एवं दमन करना चीन की फितरत बन गयी है।
अपने बड़े आकार और आर्थिक ताकत की धौंस चीन पूरी दुनिया को देता है। ताकत के बेशर्म और अश्लील प्रदर्शन के कारण ही चीन आज पूरी दुनिया की निगाह में चढ़ चुका है और अब एक-दो देश को छोड़कर दुनिया का कोई भी राष्ट्र चीन को आगे बढ़ते और मजबूत होते नहीं देखना चाहता है, क्योंकि चीन के और ताकतवर होने का मतलब है दुनिया का खतरे में पड़ जाना।
विस्तारवादी चीन 1962 में धोखे से हमला कर भारत के बड़े भूभाग पर कब्जा कर चुका है, भारत के अक्साईचिन को पाकिस्तान के साथ षड़यंत्र करके अवैध रूप से हड़प चुका है, लेकिन फिर भी चीन का पेट भरने का नाम नहीं लेता है। भारत के ही बराबर आबादी होते हुए भी चीन तीन गुना अधिक क्षेत्रफल पर काबिज हैे, लेकिन फिर भी अरुणाचल, लद्दाख से लेकर सिक्किम तक, भारत के कई हिस्से पर उसकी निगाह है।
चीन अरुणाचल को भारत के हिस्से के रूप में मान्यता नहीं देता और लद्दाख पर अपना दावा करता है। दरअसल चीन हर साल धीरे-धीरे भारत की जमीन पर कब्जा करता रहता था, लेकिन अब भारत ने पूरे एलएसी पर सड़क, पुल, फ्लाईओवर और सुरंगों का नेटवर्क बनाकर अपनी सीमा की सुरक्षा को मजबूत किया है। यही बात चीन को पच नहीं रही है।
एलएसी पर भारत के तेजी के साथ किये जा रहे ढांचागत विकास के कारण चीन बौखलाया हुआ है और इसी के चलते वह कभी चोरी छिपे भारत में घुसपैठ कर रहा है, कभी गलवान झड़प करता है और कभी लद्दाख एवं अरुणाचल को भारत का अंग नहीं मानने की बात करता है। लद्दाख पर भारत के कब्जे को अवैध बताने पर भारत सरकार ने भी चीन को चेतावनी दी है कि भारत के आंतरिक मामलों में वह दखल न दे।
लेकिन चीन चेतावनी को कभी मानने के बजाय लगातार धूर्तता करता रहता है। इसलिए अब भारत सरकार को अनुनय-विनय, चेतावनी, कूटनीतिक पहल और चीनी हरकतों को नजरअंदाज करने के बजाय चीन के नहले पर दहला मारने के अंदाज में जवाब देना होगा। अगर चीन अरुणाचल या लद्दाख के मामले में दखल देता है तो भारत को भी चीन के मामले में उससे कई गुना अधिक दखल देना चाहिए।
भारतीय राजनय अगर एक डॉक्ट्रिन के तहत यह तय कर ले कि चीन को उसी अंदाज में जवाब देना है तो जब भी चीन लद्दाख, कश्मीर या अरुणाचल के मामले को उछाले तो पलटवार में भारत को भी तिब्बत पर अवैध कब्जे, हांगकांग में लोकतंत्र के दमन, मंगोलियाई संस्कृति एवं भाषा को खत्म कर हान संस्कृति एवं चीनी भाषा थोपने की कोशिश, उइगर मुसलमानों के दमन और कोरोना फैलाने में चीन की भूमिका पर सवाल खड़ा कर उसको घेरना चाहिए।





