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‘निर्माण से निर्वाण तक’ में दिखी गौतम बुद्ध की आत्मकथा

,बीएनए में आयोजित स्वर्ण जयंती समारोह
लखनऊ। बिपिन कुमार के परिकल्पना व निर्देशन में नाटक निर्माण से निर्वाण तक का मंचन ,बीएनए में आयोजित स्वर्ण जयंती समारोह में किया गया। नाटक निर्माण से निर्वाण तक उड़िया के प्रसिद्ध नाटककार बिजय मिश्र द्वारा लिखित तट निरंजना पर आधारित है। इस नाटक में, लेखक नदी भू-आकृति विज्ञान के रूपक को लेकर कथा का नैरेटिव गढ़ता है, जो विभिन्न अनुक्रमों के अनुरूप दृश्यमान होता है जैसे नदी का पहला चरण (युवा चरण), नदी का दूसरा चरण (परिपक्व चरण), और नदी का तीसरा चरण (बृद्ध चरण)। नाटक के प्रमुख पात्र नीललोहित और इच्छामती गौतम बुद्ध के युवावस्था के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके मन के विभिन्न चरणों को दशार्ते हैं। नीललोहित भ्रमित है, जबकि इच्छामती सबल है। नदी के पहले चरण में पानी का वेग बहुत अधिक होता है, नीललोहित आनन्द के ह्यनियमों व विनियमों और इच्छामती के दृढ़ व मुक्त विचारों के बीच फँसा हुआ है। नीललोहित द्वारा अनुभव की गयी भ्रम की स्थिति (गौतम बुद्ध का मन) दूसरे दृश्य में स्पष्ट होती है, जहाँ सुजाता व इच्छामती के प्रश्नों से गौतम बुद्ध व्यग्र हो उठते हैं। बुद्ध इस बात पर चिन्तन करने लगते हैं कि मानवता की भलाई हेतु पर्याप्त पहलुओं की खोज नहीं हुई है और यह भी कि मानवीय इच्छाएँ अनन्त और असीम हैं। उनके संघ में पहले से ही इस बात पर जोर दिया जाता रहा है कि अपेक्षाएँ दु:ख का मूल कारण हैं। हालाँकि, यह समस्त विचार भी गौतम को संतुष्ट नहीं कर पाते, इसलिए वह आगे के शोध व पुनराविष्कार के बारे में सोचते हैं और पत्नी यशोधरा (गोपा) से मिलने के बाद ही पुनरारम्भ करने का फैसला करते हैं। लेकिन पत्नी से मुलाकात उनके लिए अर्थ साबित होती है, क्योंकि यशोधरा (गोपा) उचित प्रतिक्रिया नहीं देती। यह इसलिए हुआ क्योंकि यशोधरा और शिष्य आनन्द इस बात से आशंकित हैं कि गौतम ने फिर कुछ नवीन खोज लिया तो जनता बुद्ध की शिक्षाओं के बारे में भ्रमित हो सकती है, उन्हें असंगत या सिद्धान्तों व नियमों की कमी मान सकती है। इसलिए आनन्द और यशोधरा उन्हें चुप कराने का विकल्प चुनते हैं। जब गौतम इस प्रसंग पर चर्चा आरम्भ करते हैं तो आनन्द उन्हें सुझाव देते हैं कि आम जनता की भलाई के लिए उनका चुप रहना ही श्रेयस्कर है। नाटक के अन्तिम दृश्य में बुद्ध पुत्र राहुल को एक मूल्यवान सीख देते हैं, जिसमें वह उसे अपना रास्ता स्वयं निर्मित करने और अपने जीवन का उद्देश्य परिभाषित करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह पहले दृश्य में इच्छामती की नीललोहित को दी गयी सलाह जैसी ही सीख है जिसमें वह नीललोहित से कहती है कि वह किसी भी चीज का अन्धानुसरण न करे बल्कि आत्ममंथन कर अपनी अद्वितीय यात्रा का पथ प्रकाशित करे। दोनों बुद्ध से इसी संतुष्टिदायक प्रतिक्रिया की आशा करते हैं। लेकिन नाटक के शुरूआती व अन्तिम दृश्य में बुद्ध पूर्ण मौन धारण कर स्वयं निर्वाण प्राप्त करते हैं, जिसके चलते नाटक का नाम बदल कर निर्माण से निर्वाण तक रखा गया है, जो यह दशार्ता है कि कैसे एक नदी अपनी पूरी यात्रा के दौरान तलक्षण्ड जमा करती चलती है और अन्तत: जब समुद्र से मिलती है तो अपना सम्पूर्ण अस्तित्व खो देती है, जो गौतम की निर्वाण प्राप्ति को दशार्ता है।

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