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खुशी से लेकर उदासी तक… हर अहसास की आवाज हुई खामोश

मशहूर गायिका आशा भोसले के निधन से संगीत जगत में शोक की लहर, सोशल मीडिया पर प्रशंसक दे रहे श्रद्धांजलि
लखनऊ। खुशी से लेकर उदासी भरे नगमों तक और पॉप से लेकर गजलों तक, हर संगीत को अपने सुरों से अमर करने वाली आशा भोसले के निधन के साथ ही भारतीय संगीत की वह बहुरंगी आवाज खामोश हो गई। उन्होंने पीढ़ियों तक श्रोताओं के दिलों पर राज किया। अपनी अनूठी आवाज से हिंदी पार्श्व गायन में अलग मुकाम हासिल करने वाली दिग्गज गायिका आशा भोसले का रविवार को निधन हो गया। वह 92 वर्ष की थीं।
आशा भोसले के निधन पर फिल्म और संगीत जगत के साथ-साथ राजनीतिक नेताओं ने भी गहरा शोक व्यक्त किया। सोशल मीडिया पर प्रशंसक उनके गीतों और यादों को साझा कर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
आशा भोसले ने अपनी बहन एवं महान गायिका लता मंगेशकर की छाया में रहकर अपनी अलग पहचान बनाई थी। दोनों बहनों ने मिलकर करीब सात दशक तक हिंदी पार्श्वगायन को अपने सुरों से समृद्ध किया। वह एक ऐसे भारत की पहचान बनीं, जो बदलते समय के साथ दुनिया से कदमताल कर रहा था। लता और आशा दोनों ऐसी आवाजें थीं, जिन्होंने पूरे उपमहाद्वीप पर राज किया। ऐसी साझा पहचान बनाई, जो सीमाओं से परे थी। यह संयोग ही है कि संगीत के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने वाली दोनों बहनों ने 92 वर्ष की आयु में ही दुनिया को रविवार (12 अप्रैल) के दिन अलविदा कहा। बड़ी बहन लता मंगेशकर को पहले शोहरत मिली। लेकिन जिंदादिल आशा ने भी जल्द ही अपनी अलग जगह बना ली और अपनी जीवंतता एवं अद्भुत बहुमुखी प्रतिभा से संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया।

12,000 गीत गाए
उन्होंने करीब 12,000 गीत गाए, जिनमें से ज्यादातर हिंदी में थे। लेकिन उन्होंने इसके अलावा लगभग 20 अन्य भाषाओं में भी गीतों को आवाज दी। यह एक ऐसा विराट सफर है, जिसे एक साथ समेट पाना आसान नहीं। आशा और उनके भाई-बहनों- लता, उषा, मीना और हृदयनाथ के लिए संगीत केवल पेशा नहीं, शायद नियति भी था। जहां लता और उषा गायिका थीं। वहीं मीना और हृदयनाथ संगीतकार हैं।

10 साल की उम्र में गाया पहला गाना

वर्ष 1933 में जन्मीं आशा को उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर ने अपने अन्य बच्चों की तरह शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दी। उन्होंने अपने पिता के निधन के बाद मात्र 10 वर्ष की उम्र में अपना पहला गीत रिकॉर्ड किया। यह 1943 में फिल्म ‘माझा बाल’ के लिए गाया मराठी गीत ‘चला चला नव बाला’ था। उन्होंने 1948 में ‘चुनरिया’ के लिए ‘सावन आया..’ गीत के साथ हिंदी फिल्म गायन के क्षेत्र में कदम रखा।
फिल्म जगत में उनके शुरूआती वर्ष संघर्ष भरे रहे। उन्हें शुरूआत में कमतर दर्जे की फिल्मों में गाने के लिए ही चुना जाता था। पहले से ही अपनी मजबूत पहचान बना चुकी लता की छाया से बाहर आना भी उनके लिए चुनौती थी।
लेकिन आशा ने कुछ ऐसा किया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। उन्होंने पार्श्वगायिका होने के मायने ही बदल दिए। उन्हें बड़ी सफलता 1950 के दशक में मिली। उन्हें खासकर संगीतकार ओ. पी. नैयर के साथ उनके जोशीले और चुलबुले गीतों ने नयी पहचान दी। उस समय पार्श्वगायन पर शास्त्रीय शुद्धता की ज्यादा छाप थी। लेकिन आशा ने उसमें अदा, शोखी और आधुनिकता का रंग भरा।
वह क्लब गीतों, कैबरे गीतों और प्रेम गीतों की आवाज बन गईं। ये ऐसे क्षेत्र थे, जिन्हें अपनाने में अन्य गायक संकोच करते थे। उनके करियर का अगला मोड़ तब आया जब 1960 और 1970 के दशक में आर. डी. बर्मन के साथ उनकी साझेदारी ने हिंदी फिल्म संगीत को नयी दिशा दी।

फेमस गाने
‘पिया तू अब तो आजा’ और ‘दम मारो दम’ जैसे गीतों ने उनकी बेजोड़ बहुमुखी प्रतिभा को सामने रखा। उनकी आवाज में मादकता भी थी, शरारत भी, विद्रोह भी था, प्रेम भी और दर्द भी लेकिन हर बार उसमें भावों की गहराई थी। आशा ने ‘मांग के साथ’, ‘अभी न जाओ छोड़ कर’, ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘दम मारो दम’ और ‘मेरा कुछ सामान’ जैसे कई यादगार गीत गाए।
आशा ने ‘दिल चीज क्या है’ जैसी गजलों, शास्त्रीय गीतों, पॉप संगीत के क्षेत्रों के अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बनाई। उन्हें कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, अनेक फिल्मफेयर पुरस्कार, भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। वैश्विक संगीत इतिहास में संभवत: सबसे लंबे समय तक सक्रिय रहने वाली गायिकाओं में शामिल आशा का निजी जीवन भी उनके पेशेवर जीवन की तरह साहसी फैसलों से भरा रहा।

इंटरनेशनल पहचान

आशा ने केवल फिल्मी गीतों के लिए ही आवाज नहीं दी। उन्होंने 1990 के दशक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी छाप छोड़ी। उन्होंने बॉय जॉर्ज के ‘बाउ डाउन मिस्टर’ में अपनी आवाज दी और बॉय बैंड ‘कोड रेड’ के साथ भी गाया। उसी वर्ष उन्हें ‘लेगेसी’ के लिए पहली बार ग्रैमी पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। उन्होंने ‘इंडीपॉप’ को भी उसी निडरता के साथ अपनाया। उनके 1997 में रिलीज हुए गैर-फिल्मी एलबम ‘जानम समझा करो’ का ‘रात शबनमी’ गीत काफी लोकप्रिय हुआ। इस गीत ने उन्हें एमटीवी और चैनल वी पुरस्कार दिलाए। साथ ही ऐसे श्रोताओं की पीढ़ी तक पहुंचाया, जो रीमिक्स के दौर में बड़ी हुई थी।

संगीत के आशा युग का अवसान : डॉ. एस.के. गोपाल
लखनऊ। भारतीय संगीत जगत के लिए 12 अप्रैल का दिन गहरे शोक और स्मरण का दिन बन गया। भारतीय चित्रपट जगत की मशहूर पार्श्वगायिका आशा भोंसले ने सदा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। परंतु यह कहना अधूरा होगा कि वे चली गईं। वे अपने सुरों में, अपने गीतों में, हमारी स्मृतियों में सदा जीवित रहेंगी। उनका स्वर केवल ध्वनि नहीं अपितु भावनाओं का ऐसा प्रवाह था जिसने पीढ़ियों को जोड़ा, संवेदनाओं को दिशा दी और जीवन के हर रंग को संगीत में ढाल दिया। उनके जाने की खबर ने संगीत जगत को स्तब्ध कर दिया किंतु उसी क्षण उनके गीतों की अनुगूंज ने यह विश्वास भी जगाया कि कुछ आवाजें समय की सीमाओं में नहीं बंधतीं। वे पीढ़ियों के बीच सेतु बनकर जीवित रहती हैं और आशा भोंसले का स्वर ऐसा ही एक सेतु था, जो अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ता है।

आशा भोंसले केवल एक पार्श्वगायिका नहीं थीं वे भावों की अनंत साधिका थीं। उन्होंने प्रेम, विरह, उल्लास, वेदना, चंचलता और भक्ति, हर भाव को अपनी आवाज में इस प्रकार ढाला कि वह श्रोता के भीतर उतरकर उसकी अपनी अनुभूति बन जाता था। अभी न जाओ छोड़कर में प्रेम की कोमलता और बिछुड़ने की कसक है, पिया तू अब तो आजा में जीवंत चंचलता और उन्मुक्त ऊर्जा, तो दिल चीज क्या है में उनकी नजाकत और शास्त्रीय गरिमा का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं में भाव की गहराई है, जो सीधे आत्मा को स्पर्श करती है। यही बहुरंगी स्वर-संसार उन्हें विशिष्ट बनाता है। वे केवल गीत नहीं गाती थीं बल्कि हर बार एक नई अनुभूति रचती थीं, एक ऐसा भावलोक निर्मित करती थीं जिसमें श्रोता स्वयं को विलीन पाता था। आशा जी के गीतों की सबसे बड़ी शक्ति यह थी कि वे जीवन के हर मोड़ पर हमारे साथ खड़े रहते थे। सुख के क्षणों में उनके स्वर आनंद को और अधिक गहरा करते थे तो दुख के समय वही आवाज संबल बन जाती थी। ये मेरा दिल प्यार का दीवाना जैसी चंचलता जीवन की सहजता का बोध कराती है, तो चुरा लिया है तुमने जो दिल को में प्रेम की मधुरता और आत्मीयता झलकती है। रात अकेली है में एकाकीपन की धड़कन सुनाई देती है, जबकि दम मारो दम में समय की युवा चेतना और उन्मुक्तता का विस्फोट दिखाई देता है। ओ मेरे सोना रे और जाने जान ढूंढता फिर रहा जैसे गीतों में उनकी आवाज एक अलग ही सहजता और आत्मीयता के साथ सामने आती है। यही कारण है कि उनके गीत केवल मनोरंजन नहीं रहे बल्कि जीवन के अनुभव बन गए। ऐसे अनुभव जो हर सुनने वाले के भीतर अलग-अलग रूपों में आकार लेते रहे।

हर दौर की आवाज बनीं आशा भोसले : अनूप जलोटा


जानेमाने गायक व संगीतकार अनूप जलोटा ने कहा कि आशा भोसले का जन्म एक संगीत परिवार में हुआ था। वह महान गायिका लता मंगेशकर की छोटी बहन थीं। शुरूआती दौर में तुलना के बावजूद उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई और अपने अनोखे अंदाज से संगीत जगत में खास मुकाम हासिल किया। उनका करियर सात दशकों से भी अधिक समय तक चला, जिसमें उन्होंने हजारों गीतों को अपनी आवाज दी। हिंदी के अलावा मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी सहित कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में भी उन्होंने गाया। उनकी बहुमुखी प्रतिभा ने उन्हें हर शैली में सफल बनाया।
आशा भोसले की जोड़ी मशहूर संगीतकार आरडी बर्मन के साथ बेहद सफल रही, जो बाद में उनके जीवनसाथी भी बने। दम मारो दम, पिया तू अब तो आजा और महबूबा महबूबा जैसे गीत आज भी लोकप्रिय हैं। उन्होंने गजल, शास्त्रीय और आधुनिक गीतों में भी अपनी गहरी पकड़ दिखाई। बदलते समय के साथ खुद को ढालने की उनकी क्षमता ने उन्हें हमेशा प्रासंगिक बनाए रखा।

सम्मान और उपलब्धियां
अपने लंबे करियर में आशा भोसले को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, फिल्मफेयर पुरस्कारों के अलावा भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान से भी नवाजा गया। उनकी लोकप्रियता भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई और भारतीय संगीत को वैश्विक मंच पर पहुंचाया।

संगीत से परे एक जीवंत व्यक्तित्व
संगीत के अलावा आशा भोसले अपने जीवंत स्वभाव और पाक-कला के शौक के लिए भी जानी जाती थीं। उन्होंने अपने नाम से रेस्तरां भी शुरू किए, जो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को दशार्ते हैं। जीवन में कई कठिनाइयों का सामना करने के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपने संघर्ष से एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की।

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