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प्रेम और कविता की गतिमय अभिव्यक्ति ‘साहिर: हर इक पल का शायर’

संगीत नाटक अकादमी के संत गाडगे प्रेक्षागृह में हुआ मंचन
लखनऊ। राजीव प्रधान द्वारा अवध कॉन्क्लेव तथा आकृति सामाजिक एवं सांस्कृतिक समिति के सहयोग से प्रस्तुत संगीतमय नाट्य-रचना साहिर: हर इक पल का शायर का एक और भव्य मंचन लखनऊ स्थित संगीत नाटक अकादमी के संत गाडगे प्रेक्षागृह में हुआ। मैं पल दो पल का शायर हूँ साहिर के जीवन-दर्शन को समेटती ये अमर पंक्तियाँ इस संध्या की भावभूमि तय करती हैं। कुछ काव्यात्मक स्वतंत्रता के साथ अनूदित इन पंक्तियों में एक ऐसे कवि की छवि उभरती है, जो क्षणिक समय का वासी है। उसकी कथा थोड़ी देर चमकती है, झिलमिलाती है और फिर हवा में विलीन हो जाती है। उसका अस्तित्व समय की विराट नीरवता में एक आह मात्र है, और उसका यौवन, एक धड़कन भर, जो पूरी तीव्रता से जलकर बुझ जाता है।
इस प्रस्तुति के केंद्र में साहिर लुधियानवी की वही दुनिया थी, एक ऐसा जीवन जो कविता में जिया गया। विद्रोह, प्रेम, पीड़ा, विरह और सत्य की अनवरत खोज से धड़कता हुआ जीवन। यह नाटक साहिर की उथल-पुथल भरी, फिर भी कोमल यात्रा को सजीव करता है और उन्हें केवल कालजयी गीतों के रचयिता के रूप में नहीं, बल्कि एक बेचैन अंतरात्मा के रूप में प्रस्तुत करता है, जो निरंतर न्याय और सौंदर्य के बीच संतुलन तलाशती रही।
चंद्र शेखर वर्मा द्वारा लिखित और गोपाल सिन्हा द्वारा निर्देशित यह नाटक साहिर की भावनात्मक और वैचारिक दुनिया का अत्यंत संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करता है। यह केवल एक क्रमबद्ध जीवन-कथा नहीं है, बल्कि कवि के अंतर्जगत में प्रवेश करता है। उसके प्रेम, मोहभंग, मौन और सक्रियतावादी चेतना को टटोलता है। मंच सज्जा और प्रकाश-योजना, जिन्हें गोपाल सिन्हा ने ही रूप दिया, कथा के भाव-बुनावट को और गहराई प्रदान करती है।
प्रमुख भूमिकाओं में डॉ. सुधांशु मणि, रुपाली चंद्रा और चंद्र शेखर वर्मा ने सशक्त अभिनय किया। इनके साथ अनुराधा टंडन, अमित हर्ष, ज्योति सिंह, आफताब आलम, आदिल और रोहित टंडन ने भी अपने प्रभावशाली अभिनय से नाटक को समृद्ध किया। डॉ. सुधांशु मणि ने अपनी सधी हुई उर्दू अदायगी और गूंजती हुई आवाज के बल पर साहिर को मंच पर जीवंत कर दिया। अमृता प्रीतम की भूमिका में रुपाली चंद्रा ने उस महान पंजाबी कवयित्री की गरिमा और भावनात्मक तीव्रता को बखूबी साकार किया। सूत्रधार के रूप में चंद्र शेखर वर्मा ने कथा की लय और प्रवाह को संतुलित ढंग से संभाले रखा।
इस संध्या का एक प्रमुख आकर्षण साहिर द्वारा लिखे गए हिंदी सिनेमा के कालजयी गीतों की सजीव संगीतमय प्रस्तुति रही। कभी कभी मेरे दिल में, तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले, मैं जिÞंदगी का साथ निभाता चला गया और अभी न जाओ छोड़ कर जैसे गीतों को डॉ. प्रभा श्रीवास्तव और पंकज कुमार ने भावपूर्ण गहराई के साथ प्रस्तुत किया, जिन्हें श्रोताओं से जोरदार तालियाँ मिलीं। गीतों का चयन और उनका नाट्य-संदर्भ में स्थान इतना सटीक था कि वे कथा के अनिवार्य अंग बन गए। श्याम (सिंथेसाइजर), अजय (तबला), मॉन्टी (बेस गिटार) और दीपक (आॅक्टोपैड) का संवेदनशील संगत संगीत को और ऊँचाई देता रहा। पृष्ठभूमि संगीत की रचना अंकुर अक्सेना ने की।
कार्यक्रम का कुशल और सौम्य संचालन अनुपमा एस. मणि ने किया। पर्दे के पीछे मंच सहयोगियों, प्रकाश सहायकों, सेट कर्मियों और मेकअप कलाकारों ने मौन समर्पण के साथ काम किया। ये वही अदृश्य हाथ थे, जिनकी बदौलत इस रंगमंचीय जादू का सृजन संभव हो सका।

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