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न्यायालय ने अवमानना कानून के प्रावधान के खिलाफ शौरी, एन राम और भूषण को याचिका वापस लेने की दी अनुमति

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरूण शौरी, पत्रकार एन राम और अधिवक्ता प्रशांत भूषण को आपराधिक अवमानना के कानूनी प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका वापस लेने की बृहस्पतिवार को अनुमति दे दी।

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ को याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने सूचित किया कि वे अपनी याचिका वापस लेना चाहते हैं, क्योंकि इसी मामले पर पहले से ही कई याचिकाएं लंबित हैं और वे नहीं चाहते कि यह याचिका उनके साथ “अटक” जाए।

पीठ ने याचिकाकर्ताओं को इस छूट के साथ याचिका वापस लेने की अनुमति दी कि वे शीर्ष अदालत के अलावा अन्य उचित न्यायिक मंच पर जा सकते हैं।

धवन ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए संक्षिप्त सुनवाई में कहा कि याचिकाकर्ता इस चरण पर इस छूट के साथ याचिका वापस लेना चाहते हैं कि उन्हें दुबारा, हो सकता है दो महीने बाद, शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने की अनुमति दी जाए।

याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय में “अदालत को बदनाम करने” को लेकर आपराधिक अवमानना से जुड़े न्यायालय की अवमानना कानून की धारा 2 (सी)(1) की संवैधानिक वैधता को संविधान के अनुच्छेद 19 में प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के संदर्भ में चुनौती दी थी।

इससे पहले, आठ अगस्त को, भरोसेमंद सूत्रों ने बताया था कि उच्चतम न्यायालय प्रशासन ने पूर्व केंद्रीय मंत्री अरूण शौरी, वरिष्ठ पत्रकार एन. राम और कार्यकर्ता एवं वकील प्रशांत भूषण की तरफ से दायर याचिका 10 अगस्त को न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति के. एम. जोसफ की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने को लेकर संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा है। हालांकि, उसी दिन यह मामला कार्यसूची से हटा दिया गया था।

बाद में यह मामला न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष यह मामला सूचीबद्ध हुआ जो पहले से ही प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना के दो अलग-अलग मामलों को देख रही थी।

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