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चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से, मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की होगी पूजा

लखनऊ। हिंदू धर्म में चैत्र माह का विशेष महत्व होता है। यह महीना हिंदू कैलेंडर का पहला महीना माना जाता है। इसी के साथ नए हिंदू विक्रम संवत की शुरूआत होती है। चैत्र नवरात्रि की शुरूआत के साथ ही नया साल शुरू हो जाता है। हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि का विशेष महत्व होता है। चैत्र नवरात्रि पर नौ दिनों तक देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान के साथ पूजा होती है। पहले दिन प्रतिपदा तिथि से घट स्थापना होती है। पंचांग के अनुसार, चैत्र नवरात्रि की शुरूआत चैत्र नवरात्रि के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है।
चैत्र प्रतिपदा तिथि 19 मार्च से शुरू होगी। जो सुबह 6 बजकर 52 मिनट से शुरू होगी। जिसका समापन 20 मार्च को होगा। उदया तिथि के अनुसार 19 मार्च को चैत्र नवरात्रि की शुरूआत को होगी। चैत्र नवरात्रि का समापन 27 मार्च को शुक्रवार होगी। नवरात्रि पर कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। जिसमें अष्टमी और नवमी तिथि का खास महत्व होता है। इन दोनों ही तिथियों पर कन्या पूजन किया जाता है। साल 2026 में चैत्र नवरात्रि की अष्टमी तिथि 26 मार्च और नवमी तिथि 27 मार्च को होगी।

चैत्र नवरत्रि 2026 नौ दिन और नौ देवियां

19 मार्च 2026- नवरात्रि दिन 1- अमावस्या, प्रतिपदा माँ शैलपुत्री पूजा और घटस्थापना
20 मार्च 2026- नवरात्रि दिन 2- मां ब्रह्मचारिणी पूजा
21 मार्च 2026- नवरात्रि दिन 3- मां चंद्रघंटा पूजा
22 मार्च 2026- नवरात्रि दिन 4- मां कुष्मांडा पूजा
23 मार्च 2026- नवरात्रि दिन 5- मां स्कंदमाता पूजा
24 मार्च 2026- नवरात्रि दिन 6- मां कात्यायनी पूजा
25 मार्च 2026- नवरात्रि दिन 7- मां कालरात्रि पूजा
26 मार्च 2026- नवरात्रि दिन 8- मां महागौरी पूजा
27 मार्च 2026- नवरात्रि दिन 9- मां सिद्धिदात्री पूजा

चैत्र नवरात्रि का शुभ मुहूर्त
चैत्र नवरात्रि 2026 कब से कब तक है: पंचांग के अनुसार चैत्र नवरात्रि का महापर्व इस साल 19 मार्च 2026, बृहस्पतिवार से प्रारंभ होकर 27 मार्च 2026, शुक्रवार तक मनाया जाएगा. इस बीच शक्ति के साधक पूरे 9 दिनों तक देवी दुर्गा की विधि-विधान से साधना-आरधना करेंगे. नवरात्रि का पहला दिन यानि चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि 19 मार्च 2026 को सुबह 06:52 से प्रारंभ होकर अगले दिन 20 मार्च 2026 को पूर्वाह्न 04:52 बजे खत्म होगी. पंचांग के अनुसार नवरात्रि पूजा के पहले दिन 19 मार्च 2026 को घट स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त प्रात:काल 06:52 से लेकर 10:10 बजे तक रहेगा. इस तरह शक्ति के साधकों को घट स्थापना के लिए पूरे सवा तीन घंटे का समय मिलेगा. इसके अलावा प्रतिपदा के दिन ही सुबह 11:47 से लेकर दोपहर 12:36 बजे तक अभिजित मुहूर्त में भी घट स्थापित किया जा सकेगा.

चैत्र नवरात्रि का धार्मिक महत्व
चैत्र नवरात्रि के 09 दिन देवी दुर्गा के पावन 09 स्वरूपों की साधना और आराधना के लिए समर्पित है. हिंदू मान्यता के अनुसार इन 9 दिनों में जप-तप और व्रत करने पर साधकों पर देवी की पूरी कृपा बरसती है. नवरात्रि की पूजा से प्रसन्न होकर मां दुर्गा अपने भक्तों के सारे दुख और कष्ट हर लेती हैं. नवरात्रि की शक्ति साधना से सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है.

कैसे करें कलश स्थापना?
नवरात्रि के पहले दिन सुबह शुभ मुहूर्त में घर के पूजा स्थान पर साफ-सफाई कर लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर मिट्टी डालकर जौ बोएं और जल से भरा कलश स्थापित करें। कलश के ऊपर आम के पत्ते और नारियल रखें। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर विधि-विधान से पूजा करें।

चैत्र नवरात्र की पूजा विधि
चैत्र नवरात्र में 9 दिनों तक माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। सुबह स्नान के बाद लाल कपड़े पर माता की प्रतिमा स्थापित करें, कलश स्थापना करें, अखंड ज्योत जलाएं, हल्दी-कुमकुम का तिलक लगाकर फूल और 16 श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती का पाठ करें, सुबह-शाम आरती करें और फलाहार या सात्विक भोग लगाएं।
कलश स्थापना (पहले दिन): पूजा स्थल को साफ कर गंगाजल छिड़कें। मिट्टी के बर्तन में जौ बोएं और उस पर कलश (लोटा) स्थापित करें। कलश में जल, सिक्का, सुपारी, और आम के पत्ते रखें, फिर नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर उस पर रखें। दैनिक पूजा में सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और उपवास का संकल्प लें। कलश और देवी दुर्गा की प्रतिमा/फोटो की पूजा करें। माता को हल्दी-कुमकुम, सिंदूर, लाल चुनरी, और फूल अर्पित करें।
देवी को 16 श्रृंगार का सामान चढ़ाएं। ‘ॐ दुं दुगार्यै नम:’ मंत्र का जाप करें।
दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और सुबह-शाम आरती करें। माता को भोग लगाएं: पहले दिन गाय के दूध से बनी खीर का भोग लगा सकते हैं। अन्य दिनों में फल, मखाना, मिश्री, या हलवा अर्पित करें। अखंड ज्योति: यदि घर में अखंड ज्योति जलाई है, तो इसकी सुरक्षा का ध्यान रखें। अष्टमी/नवमी: नौ कन्याओं को भोजन कराएं, उन्हें उपहार दें और माता के स्वरूप में पूजा करें। विसर्जन (दसवें दिन): अंतिम दिन पूजा के बाद कलश को विसर्जित करें।

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