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भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र भारतीय सांस्कृतिक चेतना के मूल स्तंभ हैं : माण्डवी सिंह

भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय, लखनऊ में सांस्कृतिक धरोहर विषय पर संगोष्ठी सम्पन्न
लखनऊ। भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय, लखनऊ के सहयोग से विश्वविद्यालय के राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली द्वारा कला संवाद (सांस्कृतिक विषयों पर चर्चा श्रृंखला) के अंतर्गत भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र: मानवता की सांस्कृतिक धरोहर विषय पर एक गरिमामय कला संवाद का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय की कुलपति एवं कार्यक्रम की अध्यक्ष प्रो. मांडवी सिंह, संगीत नाटक अकादमी के सचिव श्री राजू दास तथा वक्ताओं विश्व भूषण, प्रो. कुमकुम धर एवं प्रो. शैलेन्द्र गोस्वामी द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया गया। अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. मांडवी सिंह ने भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र के अंतसंर्बंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ये दोनों ग्रंथ भारतीय सांस्कृतिक चेतना के मूल स्तंभ हैं, जो जीवन-दर्शन और कला-दर्शन के मध्य सशक्त सेतु का कार्य करते हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा में साधना, अनुशासन एवं सत्यनिष्ठा की अनिवार्यता पर बल दिया। नाट्यशास्त्र की व्यापकता पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें अभिनय, ताल, छंद एवं गति जैसे सभी आयाम समाहित हैं और इसकी सूक्ष्मता एवं समग्रता अद्वितीय है। उन्होंने नाट्यशास्त्र को पंचम वेद बताते हुए विद्यार्थियों को इसके गहन अध्ययन हेतु प्रेरित किया। साथ ही, उन्होंने संगीत नाटक अकादमी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे संवाद विश्वविद्यालय के शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होते हैं।
वक्ता के रूप में श्री विश्व भूषण ने भगवद्गीता में निष्काम कर्म की व्यावहारिक अवधारणा को स्पष्ट करते हुए मैं की दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि समस्त ग्रंथों का मूल आधार संवाद है तथा अनुभूतियाँ अपरोक्ष होती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि नाट्य के बिना किसी भी रस की अभिव्यक्ति संभव नहीं है और मनुष्य का जन्म उसके पूर्व कर्मों के अनुसार ईश्वरीय व्यवस्था के अंतर्गत होता है। संवाद के द्वितीय क्रम में प्रो० कुमकुम धर ने नाट्यशास्त्र एवं अष्टनायिका विषय पर व्याख्यान देते हुए बताया कि यूनेस्को द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता और भरतमुनि के नाट्यशास्त्र की पांडुलिपियों को मेमोरी आॅफ द वर्ल्ड रजिस्टर में शामिल किया गया है। उन्होंने रस सिद्धांत की व्याख्या करते हुए स्थायी भाव, विभाव एवं संचारी भावों पर विस्तार से चर्चा की तथा अभिनय के विभिन्न आयामों को स्पष्ट किया।
अगले क्रम में प्रो० शैलेन्द्र गोस्वामी ने भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र के संदर्भ में साधना एवं संगीत के विशेष आयामों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रेमभाव साधना का आधार है। उन्होंने नाट्यशास्त्र में वर्णित छंद, अलंकार, भाव तथा रंगमंचीय संरचना का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के अंत में वक्ताओं ने प्रेक्षागृह में उपस्थित शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों से संवाद स्थापित किया तथा उनके प्रश्नों के उत्तर दिए। कार्यक्रम का संचालन विजय सिंह द्वारा प्रभावी रूप से किया गया।

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