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विकट संकष्टी चतुर्थी 5 को, बप्पा की होगी आराधना

लखनऊ। हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना गया है। प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। वैशाख माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को विकट संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से पूजन करने से जीवन के कठिन से कठिन संकट दूर हो जाते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 5 अप्रैल दिन रविवार को सुबह 11 बजकर 59 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इसका समापन 6 अप्रैल को दोपहर में 2 बजकर 10 मिनट पर होगा। ऐसे में वैशाख संकष्टी चतुर्थी का व्रत 5 अप्रैल को रखा जाएगा।

विकट संकष्टी चतुर्थी का महत्व
पौराणिक मान्यता है कि वैशाख माह की संकष्टी चतुर्थी विशेष फलदायी होती है। इस दिन व्रत रखकर और चंद्रोदय पर पूजा कर गणेश जी को प्रसन्न किया जाता है। यह व्रत दुख, रोग, विघ्न और आर्थिक संकटों से मुक्ति दिलाने वाला होता है। ऐसा कहा जाता है कि इस व्रत से घर-परिवार में सुख-शांति, सौभाग्य और संतोष का वास होता है।

वैशाख संकष्टी चतुर्थी कथा
पुराण के अनुसार कामासुर नामक दैत्य का दमन करने हेतु भगवान गणेश, विकट रूप में अवतरित हुये थे. भगवान विकट का स्वरूप अत्यन्त विशाल है। वे विभिन्न शस्त्रों को धारण किये हुये मयूर पर आरूढ़ रहते हैं। भगवान विकट की गदा के मात्र एक प्रहार से ही कामासुर परास्त हो गया था। अपने प्राणों की रक्षा हेतु उसने भगवान विकट की शरण में जाने का निश्चय किया जिसके कारण समस्त लोकों को उसके त्रास से मुक्ति प्राप्त हुई। समस्त प्रकार के ज्ञात-अज्ञात भय, रोग, शोक एवं दुर्घटनाओं से मुक्ति हेतु भगवान विकट की पूजा की जाती है।

वैशाख संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। भगवान गणेश का ध्यान करके व्रत का संकल्प लें। घर के मंदिर या साफ स्थान पर चौकी रखें। लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। गणेश जी की मूर्ति/चित्र स्थापित करें। दूर्वा (घास), मोदक या लड्डू, रोली, अक्षत, फूल धूप, दीप, नारियल चढ़ाएं। धूप-दीप जलाएं, ॐ गणेशाय नम: का जाप करें। विकट संकष्टी चतुर्थी की कथा सुनें और आरती करें। दिनभर उपवास रखें (फलाहार कर सकते हैं) मन, वाणी और कर्म से शुद्ध रहें। रात में चंद्रमा के दर्शन करें, अर्घ्य दें। चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलें, प्रसाद ग्रहण करें।

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