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फर्जी जन्म प्रमाण पत्र मामले में आजम खान, पत्नी और बेटे को मिली जमानत

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सपा नेता आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम खान के कथित फर्जी जन्म प्रमाण पत्र मामले में मोहम्मद आजम खान, बेटे मोहम्मद अब्दुल्ला आजम खान और पत्नी डाक्टर तजीन फातिमा को मंगलवार को जमानत दे दी।

हालांकि, इन याचिकाकर्ताओं को जमानत देते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने आदेश दिया कि आजम खान की पत्नी और बेटे को संबंधित मजिस्ट्रेट के आदेश के मुताबिक मुचलके पर रिहा किया जाए, लेकिन आजम खान को शिकायतकर्ता का बयान निचली अदालत द्वारा दर्ज किए जाने के बाद रिहा किया जाए।

उल्लेखनीय है कि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता आकाश सक्सेना ने एक एफआईआर दर्ज कराई थी जिसमें उसका आरोप था कि आजम खान और डाक्टर तजीन फातिमा ने अपने बेटे अब्दुल्ला आजम खान के दो स्थानों से दो जन्म प्रमाण बनवाए थे जिसमें एक प्रमाण पत्र 28 जनवरी, 2012 को नगर पालिका परिषद रामपुर से, जबकि दूसरा प्रमाण पत्र 21 अप्रैल, 2015 को नगर निगम लखनऊ से बनवाया था।

पहले जन्म प्रमाण पत्र में जन्म तिथि एक जनवरी, 1993 दर्ज है और इस प्रमाण पत्र का उपयोग पासपोर्ट आदि बनवाने में किया गया और विदेश यात्रा में इसका दुरुपयोग किया गया। वहीं दूसरे जन्म प्रमाण पत्र में जन्म तिथि 30 सितंबर, 1990 दर्ज है और इसका दुरुपयोग सरकारी दस्तावेजों, विधानसभा चुनाव लडऩे और जौहर युनिवर्सिटी को विभिन्न मान्यता दिलाने में किया गया। दोनों जन्म प्रमाण पत्र जाली थे और आरोपी व्यक्तियों द्वारा निजी लाभ के लिए इनका उपयोग किया गया।

जमानत देते हुए अदालत ने कहा, इस अदालत का विचार है कि चूंकि तीसरे याचिकाकर्ता (अब्दुल्ला आजम खान) ने नगर निगम, लखनऊ के समक्ष अपनी जन्म तिथि बदलने के लिए कोई हलफनामा नहीं दिया है, लेकिन इसे तजीन फातिमा और मोहम्मद आजम खान द्वारा किया गया, इसलिए वह तत्काल प्रभाव से रिहा किए जाने का पात्र है।

अदालत ने कहा, तजीन फातिमा को महिला होने के नाते सीआरपीसी की धारा 437 (1) का लाभ मिलना चाहिए और उसे जमानत पर रिहा किया जाए। वहीं मोहम्मद आजम खान को शिकायतकर्ता का बयान निचली अदालत में दर्ज होने की तिथि पर ही रिहा किया जाए। सभी आवेदकों के आपराधिक इतिहास हैं, लेकिन किसी भी मामले में अदालत द्वारा इन्हें दोषी करार नहीं दिया गया है।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता जांच के दौरान या मुकदमे की सुनवाई के दौरान गवाहों पर दबाव डालकर मुकदमे के साक्ष्य से छेड़छाड़ नहीं करेंगे और सुनवाई टलवाने का प्रयास किए बगैर सुनवाई में सहयोग करेंगे। साथ ही वे जमानत पर रिहा होने के बाद किसी आपराधिक गतिविधि में संलिप्त नहीं होंगे या कोई अपराध नहीं करेंगे।

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