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अशोक का आत्मबोध बना विजय-पर्व की आत्मा

-संत गाडगे जी महाराज प्रेक्षागृह में ऐतिहासिक नाट्य प्रस्तुति ने बांधा समां
लखनऊ। संत गाडगे जी महाराज प्रेक्षागृह, गोमती नगर में उस समय इतिहास जीवंत हो उठा जब संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से संस्था विजय बेला एक कदम खुशियों की ओर, लखनऊ ने ऐतिहासिक नाटक विजय-पर्व का प्रभावशाली मंचन किया। सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रामकुमार वर्मा की रचना और चंद्रभाष सिंह के सशक्त निर्देशन ने प्रस्तुति को ऊंचाई प्रदान की। प्रथम अंक में सत्ता-संघर्ष का तीखा स्वर दर्शकों को सीधे मौर्यकाल की राजनीतिक हलचलों में ले जाता है। अमात्य-मंडल द्वारा अशोक को उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के साथ ही भाइयों सुसीम और सुगाम की महत्वाकांक्षा षड्यंत्र में बदल जाती है। सोन नदी के तट पर रची गई योजना और अशोक का धैर्यपूर्ण आत्मविश्वास यह स्पष्ट कर देता है कि उनकी विजय केवल शौर्य की नहीं, बल्कि संयम और दृढ़ता की भी है।
द्वितीय अंक में उज्जयिनी और पश्चिम-चक्र की राजनीति के माध्यम से सुगाम की महत्वाकांक्षा और कलिंग-नरेश के साथ उसकी गुप्त संधि कथा को रोचक मोड़ देती है। गुप्तचर विभाग की सजगता और अशोक की क्षमाशीलता उनके चरित्र की उदात्तता को रेखांकित करती है। नाटक का चरम बिंदु कलिंग युद्ध का दृश्य रहा। प्रकाश और ध्वनि के सशक्त संयोजन के बीच युद्ध की विभीषिका, घायल सैनिकों की कराह और एक शोकाकुल माँ की वेदना ने सभागार को स्तब्ध कर दिया। यही वह निर्णायक क्षण था जब अशोक के भीतर करुणा का उदय होता है। 261 ईसा पूर्व की इस ऐतिहासिक घटना को निर्देशक ने संवेदनात्मक तीव्रता के साथ प्रस्तुत किया, जहां तलवार की विजय पर आत्मबोध की विजय भारी पड़ती है। प्रस्तुति में जूही कुमारी, मुस्कान सोनी, नीलम मसीह, लावण्या बाजपेई, लता बाजपेई, नरेंद्र पाठक, प्रणव श्रीवास्तव, मुकुल कुमार, गिरिराज किशोर शर्मा, मृत्युंजय प्रकाश, मो. आवेश, आयुष प्रजापति, कृष्ण कुमार पाण्डेय, उज्ज्वल सिंह एवं प्रेम कुमार ने प्रभावशाली अभिनय किया। पार्श्व-संगीत पंकज कश्यप और प्रकाश सुभम गौतम का रहा, जिसने भाव-संप्रेषण को और प्रखर बनाया।
विजय-पर्व ने यह स्थापित किया कि वास्तविक विजय शत्रु के विनाश में नहीं, बल्कि अंतर्मन के परिवर्तन में निहित है। नाटक में जूही कुमारी, मुस्कान सोनी, नीलम मसीह, लावण्या बाजपेई, लता बाजपेई, नरेंद्र पाठक, प्रणव श्रीवास्तव, मुकुल कुमार, गिरिराज किशोर शर्मा, मृत्युंजय प्रकाश, मो. आवेश, आयुष प्रजापति, कृष्ण कुमार पाण्डेय, उज्ज्वल सिंह एवं प्रेम कुमार ने अपने अभिनय से पात्रों को सजीव कर दिया।

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