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आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग भारत के परिपेक्ष्य मे

लखनऊ/लेख- भारत मे अक्टूबर 1986 से आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस और रोबोटिक की शुरुआत बेगलुरु शहर से हुई और नवम्बर 2000 से क्रियाशील हुई जब डिफेंस रिसर्च और डेव्लपमेंट ऑर्गनाइज़ेशन (डीआरडीओ) की मदद से कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन और इंटेलिजेंस के क्षेत्र मे पदार्पण किया। जीवन मे समय के साथ साथ बदलाव ही स्थाई सत्य है जो कि आवश्यक भी है।

भारत एक युवा देश है, जहां 50% से ज्यादा आबादी 16 वर्ष से 40 वर्ष के बीच की है। लेकिन आज के वर्तमान के परिपेक्ष मे देखा जाए जहां विकास की ओर अग्रसर भारत मे नौजवान युवक युवतियाँ बेरोजगारी की पीड़ा को झेल रहे हैं, औसतन बेरोजगारी की दर 8.33% है। ऐसे मे आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग नौजवान युवकों और युवतियों के लिए अभिशाप से कम नहीं है। अकेले बैंकों द्वारा नवोन्मेषी तकनीकी स्टार्ट अप ऋण से बेरोजगारी खत्म नहीं हो सकती क्यूंकि करीब 90% स्टार्ट अप पहले वर्ष मे ही फ़ेल हो जाते हैं और बचे हुए 10% मे भी 2 से 5 वर्षों मे 70% स्टार्ट अप बंद हो जाते हैं, जिसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। जैसे कम मात्रा मे उत्पादन, बाजार मे पहले से जमे बड़े व्यापार की बराबरी न कर पाना, अनुभव और सही मार्गदर्शन की कमी और लाभ का मार्जिन कम रखना ही नवोन्मेषी तकनीकी स्टार्ट अप ऋण और एमएसएमई ऋण के विफलता का मुख्य कारण हैं।

इसी प्रकार एमएसएमई मे औसत व्रद्धि 11.93% है और विफल होने वाली इकाई का औसत 80.30% है जो कि नवोन्मेषी तकनीकी स्टार्ट अप ऋण की विफलता की दर से ज्यादा पीछे नहीं है, बैंकों मे एन पी ए का बोझ बढ़ने का सबसे बड़ा कारण ये है कि 80.30% नए लघु और मध्यम इकाई मे दिये जाने वाले ऋण भी एक से तीन वर्ष के अंदर बंद होने के कगार पर खड़े हो जाते हैं, जिसके कारण बैंकों द्वारा दिये जाने वाले ऋण प्रथम वर्ष से ही नवोन्मेषी तकनीकी स्टार्ट अप ऋण और एमएसएमई ऋण बैंकों मे एन पी ए का बोझ बढ़ाता है। केवल 50 विलफुल डीफौल्टेर्स ( इरादतन चूककर्ता) का ही बकाया राशि करीब एक लाख करोड़ है।

कुछ ही स्टार्ट अप अभी तक सफल हुए जिनमे फ्लिपकार्ट, बाइजूस, लेंसकार्ट, ओला, ड्रीम-11, स्विग्गी, रेजरपे, ओयो, फार्म ईज़ी फ़र्म जो उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। ऐसी स्थिति मे अपने देश मे आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग को अपनाना चुनौतीपूर्ण कदम होगा। देश का विकास जरूरी है किन्तु बेरोजगार नव युवक युवतियों की कीमत पर नहीं होना चाहिए इससे बेरोजगारी कों बढ़ावा मिलेगा और देश मे अस्थिरता और असन्तोष का वातावरण बनेगा जिसके कारण नव युवक और युवतियां अशांति का मार्ग अपना सकते हैं। जो कि देश के हित मे संभवतः कतई बेहतर कदम नहीं होगा। इस तरह की घटनाएँ पहले भी कई देशों मे घट चुकी हैं। उधारण के रूप मे चीन, कोरिया, वियतनाम आदि।

आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग ने पहले ही देश की सुरक्षा व्यवस्था, स्वास्थ, कृषि, सुरक्षा, सोशल मीडिया, पर्यटन, शिक्षा के क्षेत्र, होटल, टेलिकॉम, प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के साथ साथ बड़े बड़े उद्योगों मे अपना पैर पसारना शुरू कर दिया है, बड़े बड़े अस्पतालों मे रोबोटिक सर्जरी की जा रही है। आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस के कारण बीमारी की सही जानकारी और बेहतर इलाज मे मदद मिल रही है। कृषि मे भी भविष्य की सटीक जानकारी मिलने से किसानों कों निसंदेह लाभ होगा। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने भी मैकिनसे कम्प्युटर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और अक्सेंचर सोल्युशंस प्राइवेट लिमिटेड से आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग कों किराए पर लिया है जो बैंक मे सुपरवाइजरी स्टाफ की जगह लेगा। वित्तीय विभागों मे होने वाले धोखाधड़ी पर लगाम लगाने मे मशीन निसंदेह अपना महत्वपूर्ण योगदान देगी।

निसंदेह आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस के आने से ग्लोबल इकॉनमी मे 14% की व्रद्धि होगी। ई कॉमर्स के प्लैटफ़ार्म पर सिफ़ारिश प्रणाली कों लागू करना, ए आई वेर्चुयल असिस्टेंट के रूप मे काम करता है, आर्टिफ़िश्यल नैरो इंटेलिजेंस (ए एन आई) जैसे अलेक्सा, गूगल असिस्टेंट और सिरी। स्वयं से चलने वाले वाहन और बायो मेट्रिक्स सिस्टम जो व्यक्ति की पहचान उसके चेहेरे, आँखों और मुंह के कॉम्बिनेशन ए आई की मदद से करती है। जिससे अपराधियों की धरपकड़ तेज होगी और अपराध नियंत्रण करने मे एक सकारात्मक कदम होगा। पुलिस अधिकारियों को जटिल कार्यों मे मदद मिलेगी। निगरानी मे सुधार बढ़ने की संभावना अधिक होगी।

लेखक बर्क हेजेस ने अपनी पुस्तक “ यू इंक “ मे लिखा है कि वर्ष 2040 तक भारत के उद्योगों और बड़े बड़े कार्यालयों मे सभी कार्य मशीन द्वारा ही होगा एक कुत्ता और एक इंसान मशीन के पास रहेगा, कुत्ते का काम रहेगा कि कोई मशीन मे हांथ ना लगाए और इंसान का काम होगा कि कुत्ते कों समय से खाना पानी देना। ऐसे मे लगता है कि ये दिन लेखक के बताए समय से बहुत जल्दी देखने को मिलेगा।

ए आई के ज्यादा उपयोग से अमीर और गरीब देशों मे तथा उनके नागरिकों के बीच खाई बढ़ जाएगी और रोजगार के बाज़ार मे बहुत नकारात्मक असर पड़ेगा। नए रचनात्मक कार्यों मे कमी होगी क्यूंकि मशीन या रोबोट दायरे से बाहर नहीं सोंच सकते, भावना विहीन, कोई सुधार की संभावना नहीं, सहानुभूति और नैतिकता का अभाव, नौकरियों का जाना और इंसान कों सुस्त बनाने मे आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस, रोबोटिक और मशीन लर्निंग का अहम रोल होगा। इसमे त्रुटियों या दोषों की संभावना अधिक रहती है। आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस से सोशल मीडिया द्वारा झूठी सूचना, गलत जानकारी, सही जानकारी के साथ खिलवाड़ संभव हो सकता है, क्यूंकि विज्ञान के क्षेत्र मे विकास के साथ साथ समाज मे बैठे कुछ असामाजिक तत्व जिन्हे “हैकेर्स” कहते हैं, इससे प्रभावित होकर हैकेर्स एआई की कार्यप्रणाली मे हस्तक्षेप कर डेटा से खिलवाड़ कर सकते हैं।

आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस, रोबोटिक और मशीन लर्निंग मे भविष्य के लिए स्नातक और परास्नातक कोर्स के लिए प्रथम यूनिवर्सल ए आई विश्वविद्यालय की शुरुआत की है। आज के समय बड़े बड़े उद्योगों मे, कॉर्पोरेट, स्वास्थ , वित्त, कृषि, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया तथा शिक्षा के क्षेत्र मे बड़ी बड़ी कार्यशाला आयोजित की जा रही है कि आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस से कैसे काम लिया जाए।

आर्टिफ़िश्यल इंटेलिजेंस की भारत मे वर्ष 2026 तक 60 प्रतिशत उद्यमों मे भागीदारी होने की संभावना है।

सर्व मित्र भट्ट
वरिष्ठ प्रबन्धक- केनरा बैंक
अंचल कार्यालय, लखनऊ

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