शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में सुरम्य सांगीतिक संध्या हुई
लखनऊ। भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय एवं भातखण्डे एलुमनी एसोसिएशन की ओर से शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में सुरम्य सांगीतिक संध्या हुई। राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में सजी संध्या में एक से बढ़कर एक प्रस्तुति देखने को मिली। मुख्य अतिथि भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. माण्डवी सिंह रहीं। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र अक्षत अवस्थी ने शास्त्रीय संगीत की अनुपम प्रस्तुति देकर उपस्थित श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। उन्होंने राग देवगिरी बिलावल में विलंबित तिलवाड़ा ताल में ए बना ब्याहन आयो प्रस्तुत किया। इसके बाद तीन ताल में छोटा ख्याल मानो जरा अब माननी तथा दादरा की सुमधुर प्रस्तुति से सभागार को रससिक्त कर दिया। उनकी गायकी में राग की शुद्धता, भाव की गहराई एवं तानों की सटीकता ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। अक्षत के साथ संगत में हारमोनियम पर दिनकर द्विवेदी, तबले पर मोहित दुबे एवं तानपुरा पर अभिषेक कुमार ने अपनी कुशल एवं सधे हुए वादन से कार्यक्रम को चार चांद लगा दिए। इस मौके पर कुलसचिव डॉ. सृष्टि धवन, डॉ. सीमा भारद्वाज, प्रो. सृष्टि माथुर, डॉ. रुचि खरे, गिरीश चंद्र बहुगुणा, डॉ. मीरा दीक्षित, आलोक कुमार पांडेय, हेमचंद्र पालीवाल सहित एलुमनी एसोसिएशन के अनेक गणमान्य सदस्य एवं संगीत प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
ध्रुपद की गूढ़ साधना और स्वर-अनुशासन का मिला प्रशिक्षण
लखनऊ। भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय में आयोजित चार दिवसीय ध्रुपद कार्यशाला का समापन शनिवार को हुआ। कार्यशाला में विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा संगीत प्रेमियों को ध्रुपद गायन की पारम्परिक साधना, उसके सैद्धान्तिक आधार और व्यावहारिक प्रस्तुति से गहराई से परिचित होने का अवसर मिला। कार्यशाला में प्रो मधु भट्ट तैलंग ने शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को ध्रुपद गायन की परम्परागत शैली, स्वर-साधना, आलाप की संरचना, ताल-व्यवस्था तथा रियाज की अनुशासित पद्धति के विविध आयामों का सप्रयोग प्रशिक्षण प्रदान किया। प्रशिक्षण सत्र के दौरान विद्यार्थियों ने अत्यंत उत्साह एवं समर्पण के साथ भाग लेते हुए ध्रुपद की पारम्परिक प्रस्तुति शैली का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो मांडवी सिंह ने कहा कि ध्रुपद भारतीय शास्त्रीय संगीत की अत्यंत प्राचीन और गरिमामयी परम्परा है, जो हमारी सांगीतिक संस्कृति की गहराई और आध्यात्मिकता का प्रतिनिधित्व करती है। विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ सृष्टि धवन भी मौजूद थीं।





