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अमृता का ख़्वाब…साहिर में मां और महबूब की मोहब्ब्त के महत्व को दर्शाया

एसएनए के संत गाडगे प्रेक्षागृह में नाटक का मंचन

लखनऊ। सोमवार को एसएनए के संत गाड्गे प्रेक्षागृह में फखरुद्दीन अली अहमद मेमोरियल कमेटी उ.प्र. सरकार व इन्स्ट्टीयूट आॅफ ह्यूमन रिसोर्सेज, रिसर्च एण्ड डेवलेपमेन्ट सोसाइटी के तत्वावाधान में नाटक अमृता का ख्वाब…साहिर का मंचन हुआ। जोकि लेखक एस.एन.लाल का लिखा हुआ था और इसका निर्देशन नवाब मसूद अब्दुल्लाह और एस.एन.लाल ने किया। यह नाटक इस दौर की उर्दू की बड़ी विभूति स्व. शारिब रिदौलवी को समर्पित था। इस अवसर पर स्व. शारिब साहब को 2 मिनट का मौन रखकर श्रृद्धांजलि भी दी गयी।
इस नाटक में बीच-बीच में साहिर के फिल्मी गीतो को गायको ने मंच पर ही प्रस्तुत किया, जोकि नाटक को और खुबसूरत बनाता है। नाटक में साहिर-अमृता की जहां पहली मुलाकात हुई, उस मुशायरे को भी पेश किया गया है, जोकि प्रीतनगर में सन 1944 में हुआ था, इस मुशायरे में जॉं-निसार अख़्तर, मजाज लखनवी, जोश मलिहाबादी, अर्श अलसियानी, अली सरदार जाफरी, अमृता प्रीतम व साहिर को मुशायरा पढ़ते हुए दिखाया गया जिसको देखकर और मुशायरा सुनकर दर्शक मनोरंजित हुए। नाटक में अमृता व साहिर के मोहब्बत के पहलूओं को उजागर किया गया है, जोकि समाज को एक संदेश देते है, यह कहानी इन लोगों की मुलाकात यानि सन 1944 से शुरु होकर साहिर के देहान्त यानि 1980 पर खत्म हो जाती है। नाटक में जहॉं एक तरफ साहिर अमृता की मोहब्बत में गिरफ्तार हो गये थे, वही अपनी मां से इतनी मोहब्बत करते थे, कि अपनी मां और अपने बीच किसी तीसरे को लाने की हिम्मत नहीं जुटा पाये। उधर अमृता ने साहिर की वजह से अपने पति प्रीतम सिंह को छोड़ दिया, लेकिन साहिर का साथ न मिलने की वजह से साहिर के इन्तेजार में ही अपने दोस्त इमरोज के साथ रहने लगी। साहिर, …अमृता का ख़्वाब था, जोकि साहिर के देहान्त के बाद टूट गया… ! फिर अमृता ने बाकी बचा अपना जीवन इमरोज के साथ ही गुजारा।
नाटक की परिकल्पना अतहर नबी साहब की थी, साहिर व अमृता के चरित्रों को सार्थक करने के लिए दिल्ली से आये कलाकारों ने साहिर का चरित्र राजीव षर्मा ने, अमृता का चरित्र चॉंद मुखर्जी ने निभाया।

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