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लोक गायिका मालिनी अवस्थी के गीतों संग सजा अभिनय का मंच

कर्ण के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को दर्शाता है ‘रश्मिरथी’

लखनऊ। भारतेंदु नाट्य अकादमी के स्वर्ण जयंती नाट्य समारोह में शुक्रवार को लखनऊ की जानीमानी लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने अपने एकल गायन से चार चांद लगा दिया, तो वहीं हिंदी साहित्य के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर के अमर खण्डकाव्य रश्मिरथी का प्रभावशाली मंचन भी किया गया। लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने अपने अंदाज में लोकगीत प्रस्तुत कर अवध की शाम को खास बना दिया। इस दौरान मालिनी अवस्थी ने भजन, अवधी गीत व रंगारंग गीतों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
‘रश्मिरथी’ का मंचन महाभारत के पात्र कर्ण के संघर्षपूर्ण जीवन, नैतिक दृढ़ता और आत्मसम्मान पर केंद्रित था। वर्ष 1952 में प्रकाशित यह खण्डकाव्य सात सर्गों में विभाजित है, जो कर्ण के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को दशार्ता है। नाटक में कर्ण को नैतिकता, मानवीय मूल्यों और कर्म की श्रेष्ठता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस प्रस्तुति के माध्यम से दिनकर द्वारा उठाए गए सामाजिक और नैतिक प्रश्न प्रभावी ढंग से सामने आए। इसमें गुरु-शिष्य परंपरा, मातृत्व के विभिन्न रूप, धर्म-अधर्म, छल-प्रपंच और युद्ध के बीच मानवता की पहचान जैसे विषयों को दशार्या गया। नाटक का केंद्रीय संदेश था कि मनुष्य का मूल्यांकन उसके जन्म या वंश से नहीं, बल्कि उसके कर्म और आचरण से होना चाहिए। रश्मिरथी के माध्यम से दिनकर का राष्ट्रवादी दृष्टिकोण और दलित-मुक्ति चेतना भी स्पष्ट रूप से प्रस्तुत हुई। कर्ण का संघर्ष एक नई मानवता की स्थापना के प्रयास के रूप में मंच पर दिखाया गया।

जब कर्ण गुस्से से हो गया लाल
जब भरी सभा में कुल गोत्र का सवाल कर कर्ण को अपमानित किया जाता है तो कर्ण गुस्से से लाल हो उठता है। इधर दुर्योधन चाल चलते हुए कर्ण का साथ देता है। वह राजा बनाकर उसका अभिनंदन करता है। अब कर्ण कौरवों का मित्र और अपने ही भाइयों का शत्रु बन जाता है। इधर कुंती, पुत्र शत्रुता के वियोग में डूबी रहती है। इसके बाद कहानी का रुख कर्ण के अतीत की ओर जाता है। कर्ण तपस्वी परशुराम के आश्रम में रहकर युद्ध विद्या सीख रहा होता है। एक दिन परशुराम कर्ण की जांघों में शिर रखकर सो रहे होते हैं, तभी विषकीट कर्ण की जांघ काटने लगता है। गुरु की नींद न टूटे, इसलिए कर्ण अपनी जांघ नहीं हिलाता और दर्द सहता रहता है। घाव से निकले खून की वजह से परशुराम की नींद खुल जाती है। कर्ण की यह दशा देखकर परशुराम ने कहा- यह साहसभरा काम मात्र एक क्षत्रिय ही कर सकता है। और ब्राह्मण मानकर शिक्षा दे रहे कर्ण को श्राप दे देते हैं। कहानी फिर कृष्ण प्रसंग में आती है। दुर्योधन पांडवों को गांव देने के लिए तैयार नहीं होता। रास्ते में लौटते वक्त कृष्ण की मुलाकात कर्ण से होती है। कृष्ण कर्ण को दुर्योधन साथ छोड़ने के लिए कहते हैं। इधर इंद्र कर्ण से उसका कवच कुडल दान में मांगता है। कर्ण दान कर देता है। कर्ण को मारने के लिए पूर षड्यंत्र तैयार कर उसका वध अर्जुन के हाथों कृष्ण करा देते हैं। अंत में कृष्ण के नेतृत्व में कर्ण की अंतिम यात्रा निकाली जाती है। वहीं 11 अप्रैल को आदि शक्ति राम शक्ति और 12 अप्रैल को दूतवाक्यम एवं अब न बनेगी देहरी नाटक का मंचन होगा।

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