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मनोहर लाल भुंगरा की प्रदर्शनी में छापाकला की संवेदनात्मक यात्रा

छापा में जीवन की प्रतिध्वनि

लखनऊ । भारतीय समकालीन कला के परिदृश्य में छापाकला (प्रिंटमेकिंग) एक सशक्त, संवेदनशील और वैचारिक माध्यम के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुकी है। इसी परिप्रेक्ष्य में नगर स्थित कोकोरो आर्ट गैलरी में प्रख्यात छापाकार मनोहर लाल भुगरा की कृतियों पर केंद्रित रेट्रोस्पेक्टिव प्रदर्शनी छापा जीवन की छाप का भव्य शुभारंभ हुआ। इस प्रदर्शनी का संयोजन क्यूरेटर वंदना सहगल द्वारा किया गया है, जबकि उद्घाटन वरिष्ठ छापाकलाकार जय कृष्ण अग्रवाल ने किया। यह प्रदर्शनी केवल एक कलाकार की कृतियों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारतीय छापाकला की ऐतिहासिक यात्रा, उसके सौंदर्यबोध और समकालीन प्रासंगिकता का एक सशक्त सांस्कृतिक दस्तावेज है। लखनऊ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा में विकसित मनोहर लाल भुंगरा ने कला एवं शिल्प महाविद्यालय लखनऊ से अपनी औपचारिक कला शिक्षा प्राप्त की और बाद में वहीं अध्यापन करते हुए एक आदर्श गुरु के रूप में स्थापित हुए। उनके लिए छापाकला केवल तकनीक का अभ्यास नहीं, बल्कि अनुभव, संवेदना और जीवन-दृष्टि का विस्तार है। गुरु-शिष्य परंपरा की इस जीवंत धारा में उन्होंने अनेक विद्यार्थियों को न केवल शिल्पगत दक्षता प्रदान की, बल्कि उन्हें स्वतंत्र सोच और प्रयोगशीलता की ओर भी प्रेरित किया।
मनोहर लाल भुंगरा की कृतियाँ जीवन के सूक्ष्म अनुभवों की गहन अभिव्यक्ति हैं। उनके प्रिंट्स में मानवीय संवेदनाएँ, सामाजिक यथार्थ और प्रकृति के तत्व एक सहज लय में उभरते हैं। विशेष रूप से लिथोग्राफी, एचिंग और लिनोकट में उनकी दक्षता उल्लेखनीय है, जहाँ वे सीमित रेखाओं और संतुलित संरचना के माध्यम से गहन भावभूमि रचते हैं। उनकी कला में एक शांत संवाद निहित है—जैसे प्रत्येक छवि दर्शक के भीतर उतरकर कोई अंतरंग कथा कहती हो।
उनकी रचनात्मकता की सबसे बड़ी विशेषता परंपरा और आधुनिकता के बीच स्थापित संतुलन है। वुडकट, एचिंग, एंग्रेविंग, लिथोग्राफ, कोलाग्राफ और स्क्रीन प्रिंटिंग जैसी विविध तकनीकों के माध्यम से वे समकालीन विषयों को अभिव्यक्त करते हैं। उनके कार्यों में सर्प, पक्षी, नारी और मछली जैसे रूपांकन बार-बार प्रकट होते हैं, जो भारतीय सांस्कृतिक स्मृति से गहराई से जुड़े हैं। उनके लिथोग्राफ विशेष रूप से एकरंगी एवं बहुरंगी संरचनाओं में रेखाओं के माध्यम से टोन, बनावट और गहराई का सृजन करते हैं—जो उनकी विशिष्ट कलात्मक पहचान है। उनकी कोलाग्राफ कृतियाँ रंग, बनावट और उभार (एम्बॉसिंग) के कारण अत्यंत प्रभावशाली हैं, जिनमें त्रि-आयामी अनुभव का सृजन होता है। कलाकार के शब्दों में उनकी रचनाएँ ह्लस्पेस का निर्माणह्व हैं—जहाँ सकारात्मक और नकारात्मक रूपों के साथ-साथ उनके मध्य स्थित सूक्ष्म संबंध भी अर्थपूर्ण हो उठते हैं। क्यूरेटर वंदना सहगल के अनुसार, छापाकला एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी मैट्रिक्स के माध्यम से छवि को कागज या वस्त्र पर स्थानांतरित किया जाता है। पारंपरिक विधाओं—वुडकट, एचिंग, एंग्रेविंग और लिथोग्राफी—से लेकर आधुनिक स्क्रीन प्रिंटिंग तक, यह माध्यम अपनी बहुलता और पुनरुत्पादन की क्षमता के कारण विशिष्ट है। एक ही मैट्रिक्स से अनेक प्रतियाँ तैयार होने की यह विशेषता इसे अन्य कलाओं से भिन्न बनाती है, वहीं प्रत्येक प्रिंट अपनी सूक्ष्म भिन्नताओं के कारण अद्वितीय भी बना रहता है। भारतीय छापाकला का इतिहास भी समृद्ध और प्रेरणादायी रहा है। 19वीं शताब्दी में राजा रवि वर्मा द्वारा ओलियोग्राफी के माध्यम से कला को जनसामान्य तक पहुँचाने का प्रयास, तथा 20वीं शताब्दी में गगनेन्द्र नाथ टैगोर,नंदलाल बोस और सोमनाथ होर जैसे कलाकारों द्वारा इसे सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाना, इस परंपरा के महत्वपूर्ण पड़ाव रहे हैं। लखनऊ में मुंशी नवल किशोर प्रैस से प्रारंभ हुई छपाई की परंपरा ने आगे चलकर रचनात्मक कला का रूप कला महाविद्यालय में ग्रहण किया गया, जहाँ पारंपरिक भारतीय दृष्टि और आधुनिक तकनीकों का सशक्त समन्वय देखने को मिलता है। प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर जय कृष्ण अग्रवाल ने मनोहर लाल भुंगरा की रचनात्मक यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने लिनोकट और वुडकट से आरंभ कर लिथोग्राफी, कोलाग्राफ और मेटल प्लेट एचिंग जैसे माध्यमों में निरंतर प्रयोग किए। सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े आकार के प्रिंट्स पर उनका कार्य उनके नवाचार और तकनीकी दक्षता का प्रमाण है। सन् 1971 के आसपास प्राप्त उच्च अध्ययन के अवसरों के बावजूद उन्होंने विदेश जाने के स्थान पर शांतिनिकेतन में सोमनाथ होर के निर्देशन में अध्ययन को प्राथमिकता दी—जो उनकी भारतीय कला परंपरा के प्रति गहरी निष्ठा को दशार्ता है। यह प्रदर्शनी मनोहर लाल भुंगरा के एक प्रिंटमेकर, शिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में उनके व्यापक योगदान को रेखांकित करती है। इसमें छापाकला के विविध माध्यमों में निर्मित 51 कृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं, जो उनकी दीर्घ साधना, प्रयोगशीलता और संवेदनात्मक गहराई का प्रमाण हैं। यह प्रदर्शनी 7 जून 2026 तक दर्शकों के अवलोकनार्थ खुली रहेगी। छापा जीवन की छाप केवल एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि उस सृजनात्मक यात्रा का उत्सव है, जिसमें कला जीवन का प्रतिबिंब बनकर उभरती है—और प्रत्येक छाप, समय और अनुभव की एक अमिट स्मृति में रूपांतरित हो जाती है।

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