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फाइलेरिया बीमारी की चपेट में प्रदेश के 50 जिले

लखनऊ। लाइलाज बीमारी फाइलेरिया की चपेट में प्रदेश के 50 जिले हैं। प्रभावित जिलों में एमडीए (डबल ड्रग थेरेपी) और आईडीए (ट्रिपल ड्रग थेरेपी) अभियान चलाकर बीमारी की रोकथाम के प्रयास किये जा रहे हैं। क्यूलेक्स मच्छर के काटने से होने वाली यह बीमारी धीरे-धीरे शरीर पर असर डालती है। संक्रमित मच्छर के काटने के 10-15 वर्षों बाद इसके लक्षण सामने आते हैं।

यह हाथ, पैर, स्तन या अंडकोश के सूजन (हाइड्रोसील), पेशाब में सफेद रंग के द्रव का स्त्राव (काइल्यूरिया), लम्बे समय से सूखी खांसी आना (ट्रोपिकल स्नोफीलिया) के रूप दिखते हंै। एक बार बीमारी होने पर इसका कोई इलाज नहीं है। इस बीमारी से बचाव के लिए फाइलेरिया रोधी औषधि का सेवन ही एकमात्र उपाय है। मौजूदा समय में प्रदेश के 50 जिले इस लाइलाज बीमारी की गिरफ्त में हैं। बीमारी की रोकथाम के लिए इन जिलों में फाइलेरिया रोग के उन्मूलन हेतु एमडीए व आईडीए कार्यक्रम संचालित किया जाता है।

50 में से 27 जिलों में आगामी 10 अगस्त से एमडीए व आईडीए कार्यक्रम किया जाना है और 19 जिलों में बीते फरवरी माह में एमडीए व आईडीए कार्यक्रम संचालित किया जा चुका है। शेष 4 जिलों (वाराणसी, प्रयागराज प्रतापगढ़ व उन्नाव) में टीएएस (ट्रांसमिशन एसेसमेंट सर्वे की गतिविधि चल रही है। फाइलेरिया रोग से प्रभावित 50 जिलों में से 17 जिलों औरैया, बहराइच बलरामपुर बस्ती, देवरिया, इटावा फरुर्खाबाद, गाजीपुर, गोण्डा, गोरखपुर, कन्नौज, कुशीनगर, महराजगंज, श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर, संतकबीर नगर एवं सुल्तानपुर में एमडीए कार्यक्रम (2 औषधियां) व 10 जनपदों कौशाम्बी, रायबरेली, चन्दौली, फतेहपुर, हरदोई, कानपुर नगर, कानपुर देहात, खीरी, मिजार्पुर एवं सीतापुर में आईडीए कार्यक्रम (3 औषधियां) चलाया जायेगा।

बचाव के लिए साल में एक बार खिलायी जाती है दवा

बीमारी से बचाव के लिए जो अभियान चलाया जाता है, उस दौरान वर्ष में एक बार (1 वर्ष से कम आयु के बच्चों को, गम्भीर रुप से बीमार व्यक्तियों एवं गर्भवती माताओं को छोड़कर) सभी व्यक्तियों को आयुवर्ग के अनुसार फाइलेरिया रोधक औषधि (डायइथाईल काबार्मैजीन, एल्बेन्डाजोल) का सेवन कराया जाता है तथा आईडीए कार्यक्रम में उक्त दोनों औषधियों के साथ लाभार्थियों को उनकी शारीरिक लम्बाई के अनुसार औषधि आइवरमेक्टिन का सेवन कराया जाता है। यह दवाएं ड्रग एडमिनिस्ट्रेटर ( डीए) अपने सामने खिलाते हैं। दवाएं घर ले जाने के लिए नहीं दी जाती हैं। सख्त हिदायत होती है कि लाभार्थी के अनुपस्थित होने पर उसकी दवा घर के अन्य सदस्यों को न दी जाये वरन पुन: भ्रमण कर अपने समक्ष दवा का सेवन कराएं। छूटे हुए लोगों को बाद में आशा कार्यकर्ताओं द्वारा घर जाकर दवा खिलायी जाती है।

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